Suvadin, Home
Nepal life 2.241M

मांगें नहीं मानी, तो फिर गंगा अनशन

किंतु स्वामी जी व्यथित हैं कि वह आज तक नहीं हुआ। इसीलिए उन्होने प्रधानमंत्री के नाम एक खुला पत्र लिखा है और उसमें लिखी तीन अपेक्षाओं की पूर्ति न होने पर आमरण अनशन करते हुए देहत्याग के अपने निर्णय से प्रधानमंत्री जी को अवगत कराया है।प्रसिद्ध पानी कार्यकर्ता श्री राजेन्द्र सिंह ने इसे सही समय पर उठाया कदम बताते हुए सभी देश-दुनिया के सभी गंगा प्रेमियों से इसके समर्थन की अपील की है।

अरुण तिवारी


स्वामी श्री ज्ञानस्वरूप सानंद को उम्मीद थी कि भारतीय जनता पार्टी जब केन्द्र की सत्ता में आयेगी, तो उनकी गंगा मांगें पूरी होंगी। अपना पिछला गंगा अनशन, उन्होने इसी आश्वासन पर तोड़ा था। यह आश्वासन तत्कालीन भाजपा अध्यक्ष श्री राजनाथ सिंह द्वारा आश्वासन दिया गया था। 20 दिसंबर, 2013 को वृंदावन के एक भवन में पुरी के शंकराचार्य स्वामी श्री निश्चलानंद जी ने अपने हाथों से जल पिलाकर आश्वस्त किया था कि राजनाथ जी ने जो कहा है, वह होगा। किंतु स्वामी जी व्यथित हैं कि वह आज तक नहीं हुआ। इसीलिए उन्होने प्रधानमंत्री के नाम एक खुला पत्र लिखा है और उसमें लिखी तीन अपेक्षाओं की पूर्ति न होने पर आमरण अनशन करते हुए देहत्याग के अपने निर्णय से प्रधानमंत्री जी को अवगत कराया है।प्रसिद्ध पानी कार्यकर्ता श्री राजेन्द्र सिंह ने इसे सही समय पर उठाया कदम बताते हुए सभी देश-दुनिया के सभी गंगा प्रेमियों से इसके समर्थन की अपील की है।

असह्य हो गई है अब गंगा उपेक्षा

निजी बातचीत में स्वामी श्री ज्ञानस्वरूप सानंद ने कहा - ''शुरु-शुरु में तो लगा कि भाजपा की सरकार कुछ करेगी। गंगाजी का अलग मंत्रालय बनाया। उमाजी ने अपेक्षा थी कि मां धारी देवी के मंदिर को डुबोने वाले श्रीनगर बांध के विरुद्ध वह खुद अनशन पर बैठी थीं। निशंक उस वक्त मुख्यमंत्री थे। उनका आश्वासन था कि धारी देवी के मंदि को बचाया जायेगा। उमाजी गंगा मंत्री बनी तो सोचा कि वह कुछ ज़रूर करेंगी। लेकिन धारी देवी की मूर्ति तो अभी भी 20-25 फीट गहरे पानी में डूबी हुई है। इस तरह करते भाजपा को तीन साल, नौ महीने तो बीत चुके; मैं और कितनी प्रतीक्षा करुं ? गंगा जी के हितों की जिस तरह उपेक्षा की जा रही है। इससे होने वाली असह्य के कारण तो मेरा जीवन ही एक यातना बनकर रह गया है। अब और नहीं सहा जाता। सरकार की प्राथमिकता और कार्यपद्धति देखते हुए मेरी अपेक्षा की मेरे जीवन में पूर्ण होने की संभावना नगण्य है। मैने, प्रधानमंत्री को एक खुला पत्र भेजकर अपनी व्यथा कह दी है। पत्र में अपनी तीन अपेक्षाएं भी लिख दी है।''

24 जनवरी को उत्तराखण्ड की उत्तरकाशी से जारी एक खुले पत्र में स्वामी श्री सानंद ने प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र भाई मोदी को 'प्रिय छोटे भाई नरेन्द्र मोदी' लिखकर संबोधित किया है। अपने संबोधन में स्वामी जी ने लिखा है - ''2014 के लोकसभा चुनाव तक तो तुम भी स्वयं को मां गंगाजी के समझदार, सबसे लाडले और मां के प्रति समर्पित बेटा होने की बात करते थे; पर मां के आशीर्वाद और प्रभु राम की कृपा से वह चुनाव जीतकर तो तुम अब मां के कुछ लालची, विलासिता प्रिय बेटे-बेटियों के समूह में फंस गये हो....।''

उन्होने लिखा है - ''मां के रक्त के बल पर ही सूरमा बने तुम्हारी चाण्डाल चौकड़ी के कई सदस्यों की नज़र तो हर समय जैसे मां के बचे-खुचे रक्त को चूस लेने पर ही लगी रहती है....।’’

तीन अपेक्षाएं

स्वामी सानंद द्वारा पत्र में प्रस्तुत तीन अपेक्षाए कुछ यूं हैं: 

अपेक्षा - एक : पहली अपेक्षा में अलकनंदा और मंदाकिनी को गंगा की बाजू बताते हुए स्वामी जी ने अपेक्षा की है कि प्रधानमंत्री जी इन दोनो बाजुओं में छेद करने वाली क्रमशः विष्णुगाड-पीपलकोटी परियोजना, फाटा-ब्यूंग तथा सिगोली-भटवारी परियोजनाओं पर चल रहे सभी निर्माण कार्यों को तुरंत बंद करायें। 

इन परियोजनाओं पर चल रहे सभी निर्माण कार्य तब तक बंद रहें, जब तक कि अपेक्षा - दो में उल्लिखित न्यायमूर्ति गिरधर मालवीय समिति द्वारा प्रस्तावित गंगाजी संरक्षण विधेयक पर संसद में विस्तृत चर्चा कर मत-विभाजन द्वारा गंगाजी के हित मेंनिर्णय नहीं हो जाता तथा अपेक्षा - तीन में अपेक्षित '’गंगा भक्त परिषद'’ की भी सहमति नहीं हो जाती।

अपेक्षा - दो :  न्यायमूर्ति गिरधर मालवीय समिति के द्वारा प्रस्तावित गंगाजी संरक्षण विधेयक पर संसद में अविलम्ब विचार कर पारित करने की बजाय, उसे ठण्डे बस्ते में डालने के लिए प्रधानमंत्री जी का जो कोई भी नालायक सहयोगी या अधिकारी अपराधी हो, प्रधानमंत्री जी उसे तुरंत बर्खास्त करें और इस खुद भी अपराध का प्रायश्चित करें। प्रायश्चित स्वरूप, वह विधेयक को शीघ्रातिशीघ्र पारित व लागू करायें। 

विक्रम संवत् 2075 में गंगा संरक्षण विधेयक को क़ानून बनाकर लागू करने तक संसद अन्य कोई भी कार्य न करे; यहां तक कि श्रृद्धांज्जलि, शोक प्रस्ताव तथा प्रश्नकाल भी नहीं। स्वामी जी ने अपेक्षा है कि सरकार और संसद के लिए मां गंगाजी के संरक्षण से ऊपर अब कुछ भी न हो।

अपेक्षा - तीन :  राष्ट्रीय स्तर पर एक 'गंगा भक्त परिषद' का गठन हो। गंगाजी के विषय में किसी भी निर्माण या विकास कार्य को करने के लिए गंगा संरक्षण विधेयक कानून ) के अंतर्गत स्वीकार्य होने के साथ-साथ गंगा भक्त परिषद की सहमति भी आवश्यक हो। 

इस 'गंगा भक्त परिषद' में सरकारी और गैर-सरकारी दोनो प्रकार के व्यक्ति, सदस्य हों। प्रत्येक सदस्य यह शपथ ले कि वह कुछ भी सोचते, कहते और करते समय गंगाजी के हितों का ध्यान रखेगा तथा उसका कोई भी बयान, सुझाव, प्रस्ताव, सहमति अथवा कार्य ऐसा नहीं होगा, जिससे मां गंगाजी का रत्ती भर भी अहित होने की रत्ती भर भी संभावना हो। 

अपेक्षाएं पूरी न हुईं तो आमरण अनशन करते हुए देहत्याग

मूल पत्र की भाषा तनिक भिन्न है। मैने, सरलता की दृष्टि से यहां से तनिक परिवर्ततन के साथ प्रस्तुत किया है। मूल भाषा पढें़ तो स्पष्ट होता है उक्त तीनों अपेक्षाएं, महज् अपेक्षाएं नहीं एक गंगापुत्र सन्यासी द्वारा एक गंगापुत्र प्रधानमंत्री को दिए आदेश हैं। इनकी पूर्ति न होने पर स्वामी श्री सानंद ने आमरण अनशन करते हुए देहत्याग और देहत्याग करते हुए प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र भाई को हत्या के लिए अपराधी के तौर पर दण्डित करने के लिए प्रार्थना का विकल्प पेश किया है। 

उन्होेने प्रधानमंत्री जी को अपने इस निर्णय से अवगत कराते हुए लिखा हुआ है कि यदि गंगा दशहरा ( 22 जून, 2018 ) तक तीनों अपेक्षायें पूर्ण नहीं हुई, तो वह आमरण उपवास करते हुए अपने प्राण त्याग देंगे। ऐसा करते हुए वह मां गंगाजी को पृथ्वी पर लाने वाले महाराजा भगीरथ के वंशज शक्तिमान प्रभु राम से प्रार्थना करेंगे कि वह, गंगाभक्त बडे़ भाई की हत्या के अपराध में छोटे भाई प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी को समुचित दण्ड दे।

कठिन उपवासों का इतिहास

गौरतलब है कि सन्यास लेने से पूर्व डाॅ. गुरुदास अग्रवाल (जी डी ) के नाम से जाने वाले स्वामी श्री ज्ञानस्वरूप सानंद की पहचान, कभी आई. आई. टी., कानपुर के प्रोफेसर और केन्द्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के सदस्य-सचिव के रूप में थी। फिलहाल, उनकी यह पहचान पुरानी पड़ चुकी। अब उनकी पहचान, गंगाजी की अविरलता के लिए व्यक्तिगत संघर्ष करने वाली भारत की सबसे अग्रणी शािख्सयत की हैं। उन्होने, सन्यासी का बाना भी अपने संघर्ष को गति देने के लिए ही धारण किया। 

स्वामी श्री ज्ञानस्वरूप सानंद गंगा मूल की भगीरथी, अलकनंदा और मंदाकिनी.. जैसी प्रमुख धाराओं की अविरलता सुनिश्चित करने के लिए पहले भी पांच बार लंबा अनशन कर चुके हैं। 

पहला अनशन : 13 जून, 2008 से लेकर 30 जून, 2008; 
दूसरा अनशन : 14 जनवरी, 2009 से 20 फरवरी, 2009;
तीसरा अनशन : 20 जुलाई, 2010 से 22 अगस्त, 2010;
चौथाअनशन : 14 जनवरी, 2012 से कई टुकड़ों में होता हुआ अप्रैल, 2012 तक और 
पांचवां अनशन : 13 जून, 2013 से 20 दिसंबर, 2013

इन पांच अनशन में प्रत्येक, कठिन उपवास और धार्मिक, राजनीतिज्ञ और स्वयंसेवी जगत के गलियारों की एक अलग दास्तां समेटे हुए है। इस दास्तां से रुबरू होने के लिए आप 'हिंदी वाटर पोर्टल’ पर उपलब्ध 'स्वामी सानंद गंगा संकल्प संवाद’ शीर्षकयुक्त एक लंबी श्रृंखला पढ़ सकते हैं। 

प्रधानमंत्री जी याद रखें, तो बेहतर

यहां याद रखने की बात यह भी है कि यह स्वामी ज्ञानस्वरूप सानंद के अनशनों और उनके समर्थन में जुटे गंगा प्रेमी समुदाय का ही प्रताप था कि तत्कालीन प्रधानमंत्री श्री मनमोहन सिंह के नेतृत्व वाली सरकार, गंगा के पर्यावरणीय प्रवाह के निर्धारण करने को लेकर, उच्च स्तरीय समिति गठित करने को विवश हुई। उसे गंगा को राष्ट्रीय नदी घोषित करना पड़ा। राष्ट्रीय गंगा नदी बेसिन प्राधिकरण का गठन हुआ। उसमें 09 गैर सरकारी लोगों को बतौर गैर-सरकारी विशेषय सदस्य शामिल किया गया। भगीरथी मूल में गोमुख से लेकर नीचे 130 किलोमीटर तक एक भूगोल को 'इको सेंसिटिव ज़ोन' यानी पर्यावरणीय दृष्टि से संवेदनशील क्षेत्र घोषित किया गया। इस क्षेत्र में आने वाली तीन बड़ी विद्युत परियोजनाओं को बंद करने का आदेश दिया गया। 

यह बात और है कि ये सभी कदम मिलकर भी गंगाजी का कुछ भला नहीं कर सके। शासकीय घोषणाओं और आदेशों पर राजनीति तब भी हुई और अब भी हो रही है; बावजूद इसके, गंगा की अविरलता और निर्मलता की चाहत रखने वाले इन अनशनों को भूल नहीं सकते। प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र भाई मोदी जी भी न भूलें तो बेहतर है।


 

More form the Internet

loading...